चुड़ैल (पंजाबी कहानी)

भागवंती को अपने घर के पास की फैक्ट्री में काम करते हुए एक साल से अधिक बीत गया था, और हर शुक्रवार को जब पचास पौंड से भरा लिफाफा वह प्रीतम सिंह की हथेली पर रख देती तो वह खुशी से उछल पड़ता था। भाई प्रीतम सिंह के लिए सचमुच यह अच्छा अनुभव था। हर समय उसका चेहरा खुश से खिला रहता था। ऐसा लगता कि जैसे वह दुबारा युवा अवस्था में प्रवेश कर रहा हो। अब तो केवल उसे एक प्रतीक्षा रहती थी कि कब हफ्ता बीते और दोनों जने एक साथ बैठें और खूब दिल भर कर इधर−उधर की बातें करें। यदि कभी वह पहले घर पहुंच जाता तो वह भागवंती की प्रतीक्षा करते−करते अधीर हो जाता और उसके पांव स्वतः घर के पास के बस स्टॉप की ओर बढ़ जाते। यदि भागवंती आती हुई नजर आ जाती तो उसकी आंखें चमक उठतीं। मुस्कान उसकी मोटी−मोटी सफेद मूछों से बाहर फूट पड़ती और उसे ऐसा लगता जैसे यह पहले वाली भागवंती नहीं, वरन कोई अप्सरा हो जो स्वर्ग छोड़ कर उस पर मोहित हो गई हो।

 वैसे तो उनकी शादी को बत्तीस साल हो गये थे और बड़े चार बच्चों का भी विवाह हो गया था, पर ऐसी खुशी उसने जीवन में पहली बार महसूस की थी। अब तो वह घर के छोटे−मोटे कामों में भी भागवंती का हाथ बंटाने लग गया था। भागवंती के मना करने पर भी थर्मस में चाय डाल देता था, टोस्ट पर मक्खन लगा देता था और उसके बनाए सेंडविच लिफाफे में रख देता था। असल में ऐसे छोटे−मोटे काम करते हुए अब उसे बेहद खुशी होने लगी थी। शायद इसी से फैक्ट्री में दिन भर कठोर परिश्रम करने के बाद भी उसे थकावट महसूस नहीं होती थी।
घर में भी कई परिवर्तन आ गए थे। बैठक में खूबसूरत कारपेट बिछ गया था। नया सोफा सेट खरीद लिया गया था। एक कोने में टेलीफोन भी रख दिया गया था। शुरू−शुरू में तो भाई प्रीतम सिंह को यह सब बहुत दिखावटी सा लगता था। उसकी पूरी जिंदगी तंगी में बीती थी। शायद इसीलिए वह ऐसी चीजों को फिजूल समझता था। उसने इसका काफी विरोध भी किया था। पर जब भागवंती ने प्यार से उसे समझाया कि यह तो उसके हाथ की कमाई का है। प्रीतम सिंह की कमाई में से तो एक पेनी भी नहीं ली है तब वह चुप रह गया। शायद इसीलिए अब जब कोई चीज वह उससे पूछे बिना भी ले आती तो वह अधिक ध्यान नहीं देता था।
पहले भाई प्रीतम सिंह भोजन करके सीधे बिस्तरे में चला जाया करता था, पर अब कभी−कभी टेलीफेान सुनने को भी बैठ जाता था। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे जब उससे एक्टर−एक्ट्रेसों के विषय में कुछ कहते तो वह ध्यान से सुनता और जब वह किसी फिल्म के बारे में आपस में चर्चा करते तो उसे बहुत प्रसन्नता होती थी। वैसे तो वह बहुत कम ही टीवी देखता था, पर जब हर शनिवार को फ्री स्टाइल कुश्ती होती तो वह सब काम छोड़ कर भी उसे अवश्य देखता। उसे अपनी जवानी के रंगीन दिन याद आने लग गये जब अपने गांव में सब से बलिष्ठ समझा जाता था। अजीब तरह की खुशी उसके चेहरे पर चमक पैदा कर देती थी और वह प्यार भरी आंखों से पास बैठी भागवंती को निहारने लग जाता था। भागवंती शर्म से आंखें नीचे झुका लेती।
अब तो वह पति पत्नी खाना भी साथ−साथ खाने लगे थे। पहले−पहले बच्चों को उनका ऐसा करना बड़ा अजीब लगता था। स्कूल में पढ़ने वाली दोनों बेटियां घुसुर−पुसुर करने लग जातीं। लड़का भी बीच−बीच में मुस्करा देता था। पर उन्हें बच्चों की यह क्रिया अच्छी नहीं लगती थी। भागवंती ने तो उन्हें झिड़क भी दिया था। साथ बैठा कर रोटी खा ली तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?… एक बार खुल कर क्यों नहीं हंस लेते….।’ इसके बाद घटना आम हो कर रह गई। अब तो बच्चे, जब भी उन्हें एक साथ बैठे देखते तो जानबूझ कर उधर जाने से कतरा जाते थे।
भागवंती में भी तो काफी परिवर्तन आ गया था। उसका रंग रूप निखर रहा था, आवाज में मिठास आ गई थी और उसके देखने के ढंग में भी अजीब तरह का बांकपन आ गया था। पहले उसका सारा ध्यान अपने लड़के−लड़कियों या बच्चों को ओर ही लगा रहता था। पर अब उसका दिल करता कि अब वह भी तो कुछ खा पी कर देखे। शायद इसी कारण वह घर के लिए सौदा खरीदते समय कई चीजें विशेषकर अपने लिए भी खरीद लेती थी। जैसे हीरा जड़ी अंगूठियां, नाइलन के खूबसूरत स्वेटर और सिर में बांधने वाले रंग बिरंगे रुमाल और ऐसा सामान जिसे पहनने ओढ़ने से वह युवती न सही तो कुछ सुंदर तो दिखाई दे। उसकी वे सभी इच्छाएं जो पहले गरीबी और बड़े परिवार के कारण मर चुकी थीं, अब पुनः अंकुरित हो रही थीं। क्रिसमस के दिन वह बच्चों के लिए खरीदे तोहफों के साथ जब भाई प्रीतम सिंह के लिए भी बढि़या सफेद कमीज और फूलों वाले हल्के आसमान रंग की टाई ले आई तो वह खुशी से पागल हो गया।
अब तो यह बात थी कि जब भी कभी भाई प्रीतम सिंह अपने मोटी−मोटी सफेद मूछों में हंसता तो भागवंती को जरा घूर कर देखता। तब उसे लगता जैसे उसके चेहरे के ऊपर का काला तिल और एक बारगी फिर कातिल बन गया हो।
ईस्टर का अवकाश था। भाई प्रीतम सिंह अपने शयनकक्ष में बैठा बीयर पी रहा था। आजकल वैसे ही वह खुश था। भागवंती अपनी पोती के लिए ऊन का स्वेटर बुन रही थी और बच्चे नीचे टेलीविजन देख रहे थे। बीयर पीते−पीते भाई प्रीतम सिंह को पता नहीं क्या सूझा कि उसने बीयर वाला बड़ा गिलास भागवंती की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘लो तुम भी बीयर की घूंट भर के देखो!’
‘नहीं जी, इससे तो दूर की तौबा भली।’ आश्चर्य से देखते हुए भागवंती ने उत्तर दिया।
 ‘लो पकड़ो भी गिलास… जहर तो है नहीं कि मर जाओगी!’ प्रीतम सिंह ने जिद की।
 भागवंती को आज पहली बार भाई प्रीतम सिंह की जिद प्यारी लगी। वह तिरछी निगाहों से उसे घूरते हुए बोली, ‘मर भी गई तो तुम कौन से आंसू गिराओगे। ले आओगे कोई गोरी मेम!’
 ‘बस एक घूंट भर के तो देखो।’ भाई प्रीतम सिंह ने बीयर का गिलास उसके होठों से लगाते हुए कहा।
 पर भागवंती ने कुछ इस ढंग से मुंह बनाया कि भाई प्रीतम सिंह कुछ निर्णय न कर सका कि हां है कि न। लेकिन थोड़ी देर के बाद जब भाई प्रीतम सिंह ने भागवंती को ओर देखा तो उसे ऐसा लगा जैसे बीयर तो उसने पी है। मगर नशा भागवंती की आंखों में उतर आया है।
 फिर वे दोनों अपने गरीबी के दिन याद करके हंसते रहे। अचानक भाई प्रीतम सिंह की निगाह भागवंती के चेहरे की ओर खिंच गई। पता नहीं क्यों उसका चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हो रहा था। आंखें किसी सरूर से मुंदी जा रही थीं। एक दो मिनट वह इसी तरह उसकी ओर ताकता रहा। पल भर के लिए उसके मन में आया कि भागवंती को अपनी बाहों में भींच ले। पर दूसरे ही क्षण उसे अपनी सफेद दाढ़ी चुभने लगी और नीचे हंस खेल रहे बच्चों की उपस्थिति का एहसास और भी चुभने लग गया। वह कितनी ही देर इसी दुविया में फंसा बीयर पीता रहा।
 काफी देर बाद फिर एक बार उसने प्यार भरी दृष्टि से भागवंती को ओर निहारा तो पता नहीं क्यों भागवंती ने झट से उसे अपनी बांहों में भींच लिया।
 ‘बदमाश, कमीनी, चुड़ैल!’ एकदम से भाई प्रीतम सिंह तड़प उठा, जैसे अचानक किसी सांप ने उसे डस लिया हो। वह अत्यंत घृणा और कड़कती आवाज में बोलने लगा, ‘बदमाश, कमीनी, चुड़ैल… और नहीं तो अपनी सफेदी का ख्याल रख… वहां फैक्ट्री में भी पता नहीं क्या गुल खिलाती होगी…’
अनुवादक− स्व. घनश्याम रंजन

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